Sunday, 4 January 2009

SBI Card - upgrade - funny

I got this as a forward.

This is "purpotedly live" recording of a converesation between an call center executive from SBI Credit card trying to upgrade a customer and resulting confusion.

I found it very funny without being crude.

Enjoy


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Dr. Zakir Naik justifies a dog's life for Non Muslims in Muslim ruled areas

Dear Readers,

Scarcely had I posted the last post about respect for Hindu gods by ordinary Muslims living in India, I got this mail.

Dr. Zakir Naik is a tele evangelist who appears regularly on TV. He is a widely accepted and respected (in Islamic circles) authority on Islam. He knows Islam - he is an authority.

So when he says something, be sure that there is no error of interpretation.

He is an Indian citizen and has taken the benefits of growing in this country - like its education, environment and so on. The Indian environment - democracy and "secularism" existing because of our Hindu ethos - allows him to continue to make comments like this - which are outright declaration of war on any non Muslim.

In this video, he is clearly telling that in a Muslim dominated land, there is no place for a non Muslim place of worship.

Why ?

Because Islam is THE only religion that is right. Everything else is wrong, it is akin to 2 + 2 = 3.

Still repeating your Nehruvian promoted bullshit of "हिंदू मुस्लिम सिख इसाई - आपस में है भाई भाई" ?

Or really believing - "मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना" ?


गंगा - जमुनी - इस देश की माटी

श्री युनुस खान - आकाश वाणी में कार्यरत हैं।

रेडियोवाणी के नाम से ब्लॉग लिखते हैं वे।

एक कविता अपने चिठ्ठे पर डाली है - जिसमे जन्माष्टमी का वर्णन है। आप पढ़ सकते हैं।

मैं शायद स्वयं को - और अन्यों को भी याद दिलाता हूँ - भारत के छोटे शहरों में जा के देखिये - आज भी यह गंगा-जमुनी जीवन शैली जीवित है।

यदि हम यह भूलने लगेंगे की इस देश की माटी में युनुस भाई जन्मते हैं, अब्दुल कलाम जन्मते हैं, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जन्मते हैं - फिर हम में और अन्य देशों में क्या अन्तर रह जाएगा.

कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है

यह कविता बचपन में पिताजी सुनाते थे - जब भी हम हतोत्साहित होते तो। सोचता हूँ, मैं तो अपनी बेटी को कुछ भी नहीं दे रहा संस्कार के रूप में।

आज भी कभी मन खट्टा होता है तो पंक्तियाँ दोहरा लेता हूँ।

कविताकोश नामक वेबसाइट से लिया गया है। सर्वाधिकार गोपाल दास जी "नीरज" के पास हैं।


छिप-छिप अश्रु बहाने वालों,
मोती व्यर्थ बहाने वालों

कुछ सपनों के मर जाने से,
जीवन नहीं मरा करता है


सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी

और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी

गीली उमर बनाने वालों,
डूबे बिना नहाने वालों

कुछ पानी के बह जाने से,
सावन नहीं मरा करता है


माला बिखर गयी तो क्या है,
खुद ही हल हो गयी समस्या

आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या

रूठे दिवस मनाने वालों,
फटी कमीज़ सिलाने वालों

कुछ दीपों के बुझ जाने से,
आँगन नहीं मरा करता है


खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी

जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती

वस्त्र बदलकर आने वालों!
चाल बदलकर जाने वालों!

चन्द खिलौनों के खोने से
बचपन नहीं मरा करता है।


लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,

लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,

तम की उमर बढ़ाने वालों!
लौ की आयु घटाने वालों!

लाख करे पतझर कोशिश पर
उपवन नहीं मरा करता है।


लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,

तूफानों तक ने छेड़ा पर,
खिड़की बन्द न हुई धूल की,

नफरत गले लगाने वालों!
सब पर धूल उड़ाने वालों!

कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से
दर्पन नहीं मरा करता है

नीरज जी की गाई हुई कविता

आज कल हिन्दी ब्लोग्स (हिन्दी चिठ्ठा) का रसपान कर रहा हूँ। जन्मपत्रिका में शुक्र भगवान् प्रबल हैं, अत; स्वभाववश ही रसिक हूँ।

बचपन में पिताजी एक कविता सुनाते थे, नीरज जी की लिखी हुई,
"चुप चुप अश्रु बहाने वालों - मोती व्यर्थ बहाने वालो.............................."


तब से नीरज जी से परिचय हुआ। फिर IIT के यूथ फेस्टिवल में नीरज जी को सुना.

आज न जाने कैसे इस ब्लॉग पर पहुँचा जहाँ नीरज जी की ही आवाज में गई कविता है - चाँदनी में घोला जाय फूलोंका शबाब।

इस कविता पर बाद में फिल्मी गीत बना था "शोखियों में घोला जाए..........

एक अन्य कविता मिली - नीरज जी ही आवाज में - कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे.....

नीरज जी की आवाज गहरी है, मादक है। आनंद लें।


स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गयी
पाँव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गयी
पात-पात झर गए कि शाख-शाख जल गयी
चाह तो सकी निकल न पर उमर निकल गयी
गीत अश्क़ बन गए, छंद हो दफ़न गए
साथ के सभी दिए, धुआँ-धुआँ पहन गए
और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवाँ गूजर गया गुबार देखते रहे

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या सरूप था कि देख आइना सिहर उठा
इस तरफ़ ज़मीन और आसमां उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा
एक दिन मगर यहाँ, ऐसी कुछ हवा चली
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली
और हम लुटे-लुटे, वक़्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की संवार दूं
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूं
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूं
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूं
हो सका न कुछ मगर, शाम बन गयी सहर
वह उठी लहर कि ढह गए किले बिखर-बिखर
और हम डरे-डरे, नीर नयन में भरे
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे

माँग भर चली कि एक जब नयी-नयी किरण
ढोलकें ढुमुक उठीं ठुमुक उठे चरण-चरण
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पडा बहक उठे नयन-नयन
पर तभी ज़हर भारी, गाज एक वह गिरी
पुंछ गया सिन्दूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से, दूर के मकान से
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे
कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे

एक छंद और है जो कि फ़िल्मी गीत में शायद नहीं है.